आज TL पर एक पोस्ट देखी, जिसमे विक्रम और बैताल का संदर्भ था। 1970-1980 के दशक मे जन्मे लोग जरूर इन नामों से वाकिफ होंगे। ये कथाओं की एक ऐसी श्रंखला थी जिसमे महाराज विक्रमादित्य को बैताल (Ghost with Body) को पकड़कर लाना था, पर जब भी वो बैताल को पकड़ते, बैताल कहानी के रूप में एक समस्या पेश करता और महाराज को उसका सर्वोत्तम हल देने को कहता, यदि महाराज मौन रहें या गलत उत्तर दें, तो महाराज का सिर टुकड़े टुकड़े हो जाता और महाराज की मृत्यु। उस समय की मशहूर बाल पत्रिका चन्दामामा मे हर अंक मे इससे संबधित एक कथा होती थी, जिससे इस पत्रिका की लोकप्रियता बहुत बढ़ गयी थी, बाद में प्रेम सागर ने इस पर टीवी सीरियल भी बनाया जो अत्यंत लोकप्रिय भी हुआ।
जब इन कहानियों को पढ़ा जाता था, तो पढने वाला भी पूरा दिमाग लगाता था कि क्या समाधान होगा बैताल के सवाल का और क्या उसका ज़वाब महाराज के जवाब से मेल खायेगा ?
हमे शायद अहसास ही नहीं, कि हमारी संस्कृति और परम्परायें कितनी समृद्ध, विशाल और व्यापक हैं। ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान नहीं। आज हम विदेशी समाधान और प्रगति के साधनो के रूप मे 5S, Six Sigma, Kaizen इत्यादि को देखते हैं। अपने वेदों, न्याय और अर्थशास्त्रों को त्याग कर बाहर के लोगों की विधियों का अनुसरण करते हैं, क्यूंकि समाज में एक मान्यता बना दी गयी जो विदेशी है वही सही है।
विक्रम और बैताल सिर्फ एक कहानी नहीं है, एक सच्चाई है, आज के दौर मे हर इंसान विक्रम की तरह अपनी मंजिल पाना चाहता है पर बैताल के रूप में कोई न कोई समस्या उसके सिर पर लटकती रहती है, फर्क सिर्फ़ इतना है अगर उस समस्या को हल न किया जाये तो न तो सिर के टुकड़े होंगे न ही मौत पर आप अपनी मंजिल से और दूर चले जायेंगे। बैताल की तरह समस्याऍं भी बार बार लौटती हैं, हर बार नए रूप में - ये आप पर है, मौन रहें या उसको हल करें।
महाराज तो अकेले थे, जो भी निर्णय लेना होता था उनको स्वम लेना होता था, पर आज का विक्रम अकेला नहीं, अनेक संसाधन हैं, सहयोगी हैं - सहायता के लिए - मार्गदर्शन के लिए।
विक्रम और बैताल - प्रमाण है कथाओं का अर्थ सिर्फ मनोरंजन ही नहीं - मार्गदर्शन भी होता है। विक्रम की तरह मंजिल हर उस इंसान को मिलती है जो खुद पर भरोसा रखता है, समस्याओं से नहीं डरता और ईमानदारी से अपनी मंजिल की और बढ़ता रहता है। धन्यवाद।
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