संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग बुरे हों तो वह निश्चित रूप से विफल हो जाएगा। इसके विपरीत, एक खराब संविधान को भी अच्छा बनाया जा सकता है यदि उसे लागू करने वाले लोग अच्छे हों।
कोई शक नहीं भारतीय संविधान दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संविधानों मे शामिल किया जाता है, पर क्या ये अपने उद्देश्य मे सफल हो पाया है ?
संविधान क्या होता है - संविधान किसी राष्ट्र का सर्वोच्च, मौलिक कानून है, जो लिखित या अलिखित दस्तावेज के रूप में सरकार की संरचना, शक्तियों और कर्तव्यों को परिभाषित करता है और साथ ही नागरिकों के अधिकारों की गारंटी देता है। यह शासन के लिए कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक ढांचा प्रदान करता है, और यह निर्धारित करता है कि कानूनों का निर्माण, व्याख्या और प्रवर्तन कैसे किया जाएगा।
पर हिन्दुस्तान मे संविधान का क्या किया जाता है - कोई चुनावी रैलिओं में इसे लहराता है - कोई अपने शरीर पर काला नीला रंग पोत कर जलूस निकलता है तो कोई इस बात पर बहस करता है कि संविधान का श्रेय सर बी.एन. राव (संवैधानिक सलाहकार) को देना चाहिए जिन्होंने अनेक देशों के संविधानों का अध्ध्यन कर संविधान का प्रारंभिक खाका (अक्टूबर 1947) तैयार किया गया जिसमें 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां शामिल थीं, जिसने आधारशिला का काम किया या डॉ बी. आर अंबेडकर (मसौदा समिति के अध्यक्ष) जिन्होंने संविधान को अंतिम रूप देने के लिए सर बी.एन. राव द्वारा तैयार किए गए मसौदे को परिष्कृत करने, विस्तारित करने और अंतिम दस्तावेज में परिपूर्ण बनाने के लिए मसौदा समिति का नेतृत्व किया।
क्या ऐसी कोई चीज या बहस किसी दूसरे देश में देखने को मिलती है, फिर हिंदुस्तान में ही क्यों ?
संविधान को मौलिक अधिकारों के बारे में जाना जाता है पर मौलिक कर्तव्यों की कोई बात नहीं करता। संविधान समानता - स्वतंत्रता की बात करता है - पर यहाँ हर निर्णय का आधार जाति और धर्म देख कर होता है। अन्य देशों में अल्पसंख्यों को (स्थान आधारित) अतिरिक्त शिक्षा की निःशुल्कसुविधा दी जाती है जिससे 40 अंक लेने वाला 90 अंक लेकर मुख्यधारा से जुड़ सके, हिंदुस्तान मे (धर्म और जाति आधारित) उसे 40 अंकों से साथ ही वो सारे अधिकार मिल जाते है जो सामान्य लोगो को 90 अंक पर मिलते। आज भारत का कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया के श्रेष्ठ 100 विश्वविद्यालयों मे नहीं है, पर शिक्षा का स्तर सुधारने के स्थान पर सरकार अधिनियम लाती है कि फैसला सही गलत नहीं बल्कि जाति के आधार पर किया जायेगा - लगभग 80% विद्यार्थी शोषण का शिकार न हो पायें 20% विद्यायर्थिओं के कारण। कौन फैसला करेगा। उदहारण के लिए कोई पिछड़ी जाति का युवा किसी उच्च जाति के युवक/ युवती को मित्रता का प्रस्ताव रखता है और अस्वीकार होने पर उसको मांसाहारी व्यंजन का न्योता दे और उसके न कहने पर जातिगत भेद भाव का आरोप लगा कर उसका कैरियर शुरू होने से पहले बर्बाद कर दे ??
जब न्याय व्यस्था इस बात के स्थान पर कि अपराधी कौन और अपराध क्या की जगह आरोपी और पीड़ित किस जाति के हैं - तो न्याय की सम्भावना वहीं क्षीण हो जाती है। क्या ये बेहतर नहीं होता कि कम से कम शिक्षा को तो इन सब बातों से अलग रखा जाता ?
संविधान का लचीलापन ही इसकी कमजोरी बन गया है। अगर दंड के प्रावधान उचित होते तो - एक जज जिसके यहाँ करोड़ों रुपये मिले - इतना विश्वास नहीं दिखाता कि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा या कोई सांसद जिसपर दलित महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार का आरोप हो खुले आम IPS और IAS अधिकारीयों को SC /ST Act मे फँसाने की धमकी नहीं देता। राजनेता अपने हिसाब से जब तब संशोधन करते रहते हैं। सिर्फ 75 वर्षों में 106 संशोधन। आरक्षण जिसकी प्रारंभिक अवधि 10 वर्ष थी, बार बार समय सीमा बढ़ाई और अब ये 2030 तक लागू है और कोई संदेह नहीं एक बार फिर से अवधि बढ़ाई जाएगी।
आरक्षण का उद्देश्य था पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व देना पर अब ये एक बैसाखी बन चूका है जिसने सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग की दुरी बहुत बढ़ा दी है। जहाँ एक और कुछ लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ उठाया दूसरी और अनेक लोग आज भी इसका लाभ नहीं उठा पाए और वंचित हैं।
इसमें कोई शक नहीं आरक्षण का इस्तेमाल आज के दौर मे केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए होता है। यदि राजनेता गंभीर होते तो सबसे पहले नियम बनाते की कोई भी सांसद या मंत्री और उनके परिवार - केवल आरक्षण द्वारा नियुक्त डॉक्टर से अपना इलाज कराएँगे और शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण करेंगे। आज छोटी से छोटी बीमारी में भी ये लोग बड़े बड़े अस्पतालों में (विदेशी हस्पताल सहित) में अपना इलाज कराते हैं और इनके बच्चे विदेशों के महँगे उच्चस्तरीय विश्वविद्यालों मे पढ़ाई करते हैं। जहाँ आज छोटे से छोटा देश भी योग्यता को प्राथमिकता देता है वहीँ समाज के हर वर्ग को सक्षम बनाने की जगह आरक्षण रूपी बैसाखी पकड़ा दी जाती है, और योग्य व्यक्ति विदेशों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं तो हम लोग उनकी तस्वीरों के साथ Indian Origin लिख कर खुश होते हैं, बिना विचार किये कि अपने देश में ये योग्यता क्यों नहीं दिखा पाते ?
इसमें कोई संदेह नहीं आज न्याय व्यवस्था बहुत बुरे दौर से गुजर रही है - दहेज़ कानून हों, या महिला सुरक्षा अथवा SC/ST Act - सालों तक निर्दोष लोग परेशान रहते हैं, उन गुनाहों को सजा भुगतते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं - और जब कभी निर्दोष साबित होते हैं तो बहुत ही कम ऐसे मामले होते हैं जब आरोपी को झूठे इलज़ाम के लिए दण्डित किया जाता हो, न तो पुलिस का कुछ बिगड़ता है जाँच पड़ताल की कार्यवाही मे लापरवाही और न ही किसी जज का - जिसके फैसले के चलते एक निर्दोष की जिन्दगी बरबाद हो जाती है - सबसे बड़ा आभाव अगर न्याय व्यस्था मे है - वो है जवाबदेही का। अगर आरोपी को पता हो - गलत और झूठे आरोप लगाने पर उसे कड़ा दंड मिलेगा तो वो किसी भी कानून का दुरूपयोग करने से पहले 100 बार सोचेगा।
उम्मीद है शायद ऐसा दौर आये जब राजनेता अपनी जाति और धर्म की वोटबैंक की राजनीति छोड़ कर सभी नागरिकों और राष्ट्र हित को प्राथमिकता दें - तभी सही अर्थों में ये देश गणतांत्रिक देश बन पायेगा।
संविधान संविधान कह कर सड़कों पर चिल्लाने से संविधान का सम्मान नहीं बढ़ता बल्कि जब सरकार और नागरिक मिलकर संविधान के नियमों का पालन करें और देश को विकास की राह पर ले चलें - इससे ही संविधान का प्रयोजन सफल होता है और सच्चे अर्थों मे संविधान की गरिमा बढ़ती है।
सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। जय हिन्द।
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